The editorial explained
The Court's recent hearing on the Delhi Revision (SIR) of electoral rolls has exposed a troubling asymmetry at the heart of India's voter-registration exercise. Justice Joymalya Bagchi's pointed queries probed whether a citizen's indolence or non-response to enumeration forms could permanently extinguish a constitutional entitlement as fundamental as the . The Bench, led by the Chief Justice, observed that the Election Commission of India (ECI) had erred in treating lapsed voters, those struck off merely for not returning forms, as fresh applicants compelled to file Form 6 afresh. This, the Court implied, inverts the natural order of accountability, since the onus of maintaining accurate rolls has traditionally rested with the state machinery, not the individual elector.
हिंदी अर्थउच्चतम न्यायालय में दिल्ली की Special Intensive Revision (SIR) से जुड़ी एक याचिका की सुनवाई में न्यायमूर्ति ज्योयमाल्य बागची ने ऐसे सवाल पूछे जो चुनाव आयोग (ECI) की इस प्रक्रिया की बुनियादी खामी को उजागर करते हैं। उन्होंने पूछा कि अगर कोई पहले से पंजीकृत मतदाता आलसी रहा, निष्क्रिय (inert) रहा या enumeration फॉर्म का जवाब नहीं दे पाया, तो क्या यह उसका मताधिकार हमेशा के लिए छीनने का आधार बन सकता है। मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि ऐसे मतदाताओं को, जिन्हें फॉर्म न भरने पर हटाया गया, नए मतदाता की तरह फॉर्म 6 भरने को मजबूर करना ECI की गलती (erroneous) थी।
বাংলা অনুবাদসুপ্রিম কোর্টে দিল্লির নির্বাচনী তালিকার বিশেষ নিবিড় সংশোধন (Special Intensive Revision - SIR) নিয়ে সাম্প্রতিক শুনানিতে ভারতের ভোটার-নিবন্ধন প্রক্রিয়ার মূলে থাকা একটি উদ্বেগজনক অসামঞ্জস্য প্রকাশ পেয়েছে। বিচারপতি জয়মাল্য বাগচীর তীক্ষ্ণ প্রশ্ন ছিল—একজন নাগরিকের অলসতা বা গণনা ফর্মে সাড়া না দেওয়া কি ভোটাধিকারের মতো একটি মৌলিক সাংবিধানিক অধিকারকে স্থায়ীভাবে বিলুপ্ত করে দিতে পারে? প্রধান বিচারপতির নেতৃত্বাধীন বেঞ্চ পর্যবেক্ষণ করে যে, নির্বাচন কমিশন (Election Commission of India - ECI) ভুল করেছে এই অর্থে যে, যেসব ভোটার কেবল ফর্ম ফেরত না দেওয়ার কারণে বাদ পড়েছেন, তাদের নতুন আবেদনকারী হিসেবে গণ্য করে ফের ফর্ম ৬ (Form 6) জমা দিতে বাধ্য করা হয়েছে। আদালতের মতে, এটি দায়বদ্ধতার স্বাভাবিক ক্রমকে উল্টে দেয়, কারণ নির্ভুল ভোটার তালিকা বজায় রাখার দায়িত্ব ঐতিহ্যগতভাবে রাষ্ট্রযন্ত্রের উপরই বর্তায়, ব্যক্তি ভোটারের উপর নয়।
The deeper infirmity, as the Bench noted, lies in the SIR's very architecture, which recasts a routine of into grounds for deletion rather than updation. Why, the judges asked, could a shifted voter not simply the new address and be re-enrolled at that location, instead of being purged from the rolls altogether? Statistical evidence lent weight to this disquiet: the proportion of draft deletions attributed to being 'shifted' or 'absent' climbed from fifty-five per cent in Bihar to a staggering seventy-two per cent across subsequent States and Union Territories during Phase 3 of the exercise.
हिंदी अर्थअसली समस्या SIR के ढांचे में ही है, जिसमें पता बदलने जैसी सामान्य बात को नाम हटाने का कारण बना दिया गया है, न कि केवल जानकारी अपडेट करने का। कोर्ट ने पूछा कि स्थानांतरित मतदाता सिर्फ अपना नया पता क्यों नहीं बता (disclose) सकते और नए पते पर फिर से दर्ज क्यों नहीं हो सकते। आंकड़े भी यही दिखाते हैं - बिहार में 'शिफ्टेड' या 'एब्सेंट' के आधार पर हटाए गए मतदाताओं का हिस्सा 55% था, जो फेज़ 3 में अन्य राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में बढ़कर 72% हो गया।
বাংলা অনুবাদবেঞ্চ লক্ষ্য করে যে, গভীরতর সমস্যাটি নিহিত রয়েছে SIR-এর নকশার মধ্যেই, যেখানে ঠিকানা পরিবর্তনের মতো একটি সাধারণ বিষয়কে তথ্য হালনাগাদ (updation) না করে তালিকা থেকে বাদ দেওয়ার কারণ হিসেবে ব্যবহার করা হচ্ছে। বিচারকরা প্রশ্ন তোলেন—স্থানান্তরিত ভোটার কেন কেবল তার নতুন ঠিকানা জানিয়ে সেখানেই পুনর্নিবন্ধিত হতে পারবেন না, কেন তাকে সম্পূর্ণভাবে তালিকা থেকে বাদ দিতে হবে? পরিসংখ্যানগত তথ্যও এই উদ্বেগকে সমর্থন করে: 'স্থানান্তরিত' বা 'অনুপস্থিত' হিসেবে চিহ্নিত খসড়া বাদ পড়ার হার বিহারে ৫৫ শতাংশ থেকে বেড়ে প্রক্রিয়ার তৃতীয় পর্যায়ে (Phase 3) অন্যান্য রাজ্য ও কেন্দ্রশাসিত অঞ্চলে বিস্ময়করভাবে ৭২ শতাংশে পৌঁছে যায়।
Karnataka's figures illustrate the scale of this erosion starkly. Roughly eighty-four lakh electors were deleted on the shifted-or-absent premise, yet the claims phase restored a net addition of merely 8.2 lakh names, including new voters. Consequently, the final roll fell short of the projected adult population by 64.5 lakh, a gap too large to be dismissed as incidental administrative friction. Such an outcome runs contrary to the ECI's historic of continually widening the , an ethos in the revision of 2002-03, when enumerators physically tracked shifted voters to their new residences and the Chief Electoral Officer the old and new entries rather than discarding them.
हिंदी अर्थकर्नाटक के आंकड़े इस समस्या की गंभीरता दिखाते हैं। लगभग 84 लाख मतदाता 'शिफ्टेड' या 'एब्सेंट' बताकर हटाए गए, लेकिन दावा चरण में केवल 8.2 लाख मतदाता (नए मतदाताओं सहित) ही जोड़े गए। नतीजतन अंतिम सूची अनुमानित वयस्क जनसंख्या से 64.5 लाख कम रह गई। यह ECI के उस ऐतिहासिक मकसद (mandate) के विपरीत है जिसमें मताधिकार का दायरा बढ़ाना शामिल है - जैसा 2002-03 की गहन (intensive) समीक्षा में हुआ था, जब enumerators शिफ्ट हुए मतदाताओं को नए पते पर ढूंढते थे और मुख्य निर्वाचन अधिकारी पुराने और नए रिकॉर्ड का मिलान (reconcile) करते थे।
বাংলা অনুবাদকর্ণাটকের পরিসংখ্যান এই ক্ষয়ের মাত্রা স্পষ্টভাবে তুলে ধরে। প্রায় ৮৪ লক্ষ ভোটারকে 'স্থানান্তরিত বা অনুপস্থিত' যুক্তিতে বাদ দেওয়া হয়েছিল, অথচ দাবি (claims) পর্বে নতুন ভোটারসহ মাত্র ৮.২ লক্ষ নাম যুক্ত হয়ে নিট সংযোজন ঘটে। ফলস্বরূপ, চূড়ান্ত তালিকা প্রত্যাশিত প্রাপ্তবয়স্ক জনসংখ্যার তুলনায় ৬৪.৫ লক্ষ কম হয়ে পড়ে—যা নিছক প্রশাসনিক ত্রুটি বলে উড়িয়ে দেওয়ার মতো ছোট ব্যবধান নয়। এই পরিণতি নির্বাচন কমিশনের ঐতিহাসিক লক্ষ্য—ভোটাধিকারের পরিসর ক্রমাগত সম্প্রসারণ—এর পরিপন্থী, যা ২০০২-০৩ সালের নিবিড় সংশোধনের মূল চেতনা ছিল, যখন গণনাকারীরা স্থানান্তরিত ভোটারদের নতুন ঠিকানায় গিয়ে খুঁজে বের করতেন এবং মুখ্য নির্বাচনী আধিকারিক (Chief Electoral Officer) পুরনো ও নতুন তথ্য বাতিল না করে একত্র করে মিলিয়ে নিতেন।
Justice Bagchi further clarified that the earlier Bihar ruling does not constitute a , and that the legality of so-called ' discrepancy' checks, permitted only as an interim arrangement in West Bengal, remains unresolved by any final adjudication. These checks, which flagged anomalies based on family size or the age gap between a voter and listed parents, enjoy no backing from any or rule, rendering them arbitrary and, in the Court's own characterisation, somewhat . In West Bengal, the fallout was large-scale , while an independent in Delhi revealed that members of the Muslim community were flagged disproportionately under this algorithm-driven filter.
हिंदी अर्थन्यायमूर्ति बागची ने यह भी स्पष्ट किया कि बिहार का फैसला कोई बाध्यकारी मिसाल (binding precedent) नहीं है, और पश्चिम बंगाल में केवल अंतरिम व्यवस्था के तौर पर अनुमति प्राप्त 'लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी' जांच की वैधता पर अभी अंतिम फैसला नहीं आया है। ये जांचें परिवार के आकार या मतदाता और माता-पिता की उम्र के अंतर के आधार पर होती थीं, जिनका कोई कानूनी आधार नहीं है, और इसीलिए इन्हें हास्यास्पद (ludicrous) कहा गया। पश्चिम बंगाल में इनसे बड़े पैमाने पर मताधिकार छिना, और दिल्ली में एक विश्लेषण से पता चला कि मुस्लिम समुदाय को असमान रूप से चिन्हित किया गया।
বাংলা অনুবাদবিচারপতি বাগচী আরও স্পষ্ট করেন যে, বিহার সংক্রান্ত পূর্বের রায়টি কোনো বাধ্যতামূলক নজির (binding precedent) নয়, এবং পশ্চিমবঙ্গে শুধুমাত্র অস্থায়ী ব্যবস্থা হিসেবে অনুমোদিত তথাকথিত 'যৌক্তিক অসঙ্গতি' (logical discrepancy) যাচাইয়ের আইনি বৈধতা এখনও কোনো চূড়ান্ত রায়ে নিষ্পত্তি হয়নি। পরিবারের আকার বা ভোটার ও তালিকাভুক্ত পিতামাতার বয়সের ব্যবধানের ভিত্তিতে অসঙ্গতি চিহ্নিত করা এই পরীক্ষাগুলোর পেছনে কোনো আইন বা বিধির সমর্থন নেই, যা একে স্বেচ্ছাচারী করে তোলে এবং আদালতের নিজস্ব ভাষায়, কিছুটা হাস্যকরও বটে। পশ্চিমবঙ্গে এর ফল হয়েছে ব্যাপক হারে ভোটাধিকার হরণ, আর দিল্লিতে একটি স্বতন্ত্র বিশ্লেষণে দেখা গেছে যে এই অ্যালগরিদম-চালিত ফিল্টারে মুসলিম সম্প্রদায়ের সদস্যরা অসামঞ্জস্যপূর্ণভাবে চিহ্নিত হয়েছেন।
The Court, however, must resist the temptation to offer only managerial palliatives, such as deadlines or displaying printed lists at block offices, remedies it has dispensed before without root causes. The errors tainting the final SIR rolls did not arise from isolated administrative lapses alone; they flowed from a structurally flawed that shifts the burden of proof onto ordinary citizens. A durable fix demands that genuinely dead or duplicate entries be purged, newly electors be added without obstruction, and voters wrongly expunged from draft rolls be reinstated without forcing them through the ordeal of fresh enrolment.
हिंदी अर्थकोर्ट को केवल प्रशासनिक उपाय जैसे समयसीमा बढ़ाना या ब्लॉक में सूची लगाना ही नहीं करना चाहिए, जैसा वह पहले कर चुका है। अंतिम SIR सूची में गलतियां किसी छोटी चूक से नहीं, बल्कि एक त्रुटिपूर्ण ढांचागत डिज़ाइन से आईं। इसलिए मृत और डुप्लीकेट नाम हटाए जाएं, नए योग्य मतदाता बिना रुकावट जोड़े जाएं, और गलत तरीके से हटाए गए मतदाताओं को बिना दोबारा आवेदन कराए वापस जोड़ा जाए।
বাংলা অনুবাদতবে আদালতকে কেবল ব্যবস্থাপনাগত সাময়িক সমাধানের প্রলোভন এড়াতে হবে, যেমন সময়সীমা বাড়ানো বা ব্লক অফিসে মুদ্রিত তালিকা প্রদর্শন করা—এমন প্রতিকার যা আগেও দেওয়া হয়েছে অথচ মূল সমস্যার সমাধান হয়নি। চূড়ান্ত SIR তালিকায় থাকা ত্রুটিগুলো কেবল বিচ্ছিন্ন প্রশাসনিক গাফিলতির ফল নয়; এগুলো এমন একটি কাঠামোগতভাবে ত্রুটিপূর্ণ নকশা থেকে উদ্ভূত, যা সাধারণ নাগরিকদের উপর প্রমাণের দায় চাপিয়ে দেয়। একটি স্থায়ী সমাধানের জন্য প্রয়োজন—প্রকৃতপক্ষে মৃত বা দ্বৈত তালিকাভুক্তি বাতিল করা, নতুন যোগ্য ভোটারদের বাধাহীনভাবে যুক্ত করা, এবং যেসব ভোটারকে ভুলবশত খসড়া তালিকা থেকে বাদ দেওয়া হয়েছে তাদের ফের নতুন করে নিবন্ধনের ঝক্কি ছাড়াই পুনর্বহাল করা।
Beyond these corrective steps, larger constitutional questions loom over how the Commission conducts such revisions and, crucially, how its own members are , questions the Court will eventually have to settle if the sanctity of universal adult suffrage is to be preserved.
हिंदी अर्थइसके अलावा आयोग के SIR संचालन और उसके सदस्यों की नियुक्ति से जुड़े बड़े सवाल भी अभी सुलझाए जाने बाकी हैं, जिन्हें कोर्ट को अंततः तय करना होगा ताकि सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार की पवित्रता बनी रहे।
বাংলা অনুবাদএই সংশোধনমূলক পদক্ষেপগুলোর বাইরেও, নির্বাচন কমিশন কীভাবে এই ধরনের সংশোধন পরিচালনা করে এবং, সবচেয়ে গুরুত্বপূর্ণভাবে, এর নিজস্ব সদস্যদের নিয়োগ কীভাবে হয়—এই বৃহত্তর সাংবিধানিক প্রশ্নগুলো এখনও অমীমাংসিত রয়ে গেছে, যার নিষ্পত্তি আদালতকে একদিন করতেই হবে, যদি সর্বজনীন প্রাপ্তবয়স্ক ভোটাধিকারের পবিত্রতা রক্ষা করতে হয়।
Based on the editorial “Deemed ineligible: On the Supreme Court and SIR” in The Hindu – read the original. Explanation, Hindi lines, vocabulary and quiz written by RBE for exam preparation. RBE is not affiliated with or endorsed by The Hindu.